योगिनी एकादशी (17 जून 2020):कैसे करे पूजा,कथा व एकादशी माता आरती|

योगिनी एकादशी (17 जून 2020,बुधवार)

YOGINI EKADASHI

आषाढ़ मास कृष्ण पक्ष 

 

वर्षभर में चौबीस एकादशी आती हैं और लौंद मास में 26 .आज हम योगिनी एकादशी के बारे में जानेंगे |

 

क्या है एकादशी

 

हिंदू पंचांग की ग्यारहवीं तिथि को एकादशी कहते हैं। एकादशी संस्कृत भाषा से लिया गया शब्द है जिसका अर्थ होता है ‘ग्यारह’। हर महीने में एकादशी दो बार आती है, एक शुक्ल पक्ष के बाद और दूसरी कृष्ण पक्ष के बाद। पूर्णिमा के बाद आने वाली एकादशी को कृष्ण पक्ष की एकादशी और अमावस्या के बाद आने वाली एकादशी को शुक्ल पक्ष की एकादशी कहते हैं। प्रत्येक पक्ष की एकादशी का अपना अलग महत्व है।

 

एकादशी का महत्त्व

 

पुराणों के अनुसार एकादशी को ‘हरी दिन’ और ‘हरी वासर’ के नाम से भी जाना जाता है। इस व्रत को वैष्णव और गैर-वैष्णव दोनों ही समुदायों द्वारा मनाया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि एकादशी व्रत हवन, यज्ञ, वैदिक कर्म-कांड आदि से भी अधिक फल देता है। इस व्रत को रखने की एक मान्यता यह भी है कि इससे पूर्वज या पितरों को स्वर्ग की प्राप्ति होती है। स्कन्द पुराण में भी एकादशी व्रत के महत्व के बारे में बताया गया है। जो भी व्यक्ति इस व्रत को रखता है उनके लिए एकादशी के दिन गेहूं, मसाले और सब्जियां आदि का सेवन वर्जित होता है।

एकादशी के दिन यह न करे

-वृक्ष से पत्ते बिना कारण  न तोड़ें।

-बाल नहीं कटवाएं।

-ज़रूरत हो तभी बोलें। कम से कम बोलने की कोशिश करें।

-एकादशी के दिन चावल का सेवन भी वर्जित होता है।

-किसी का दिया हुआ अन्न आदि न खाएं।

-मन में किसी प्रकार का विकार न आने दें।

एकादशी पूजा विधि

एकादशी में क्या खाएं 

 

शास्त्रों के अनुसार श्रद्धालु एकादशी के दिन ताजे फल, मेवे, चीनी, कुट्टू, नारियल, जैतून, दूध, अदरक, काली मिर्च, सेंधा नमक, आलू, साबूदाना और शकरकंद अर्थात् उपवास में खायी जाने वाली चीजों का प्रयोग कर सकते हैं। एकादशी व्रत का भोजन सात्विक होना चाहिए।

 

 एकादशी व्रत पूजा विधि

 

– एकादशी के दिन प्रात:काल स्नान के बाद सर्वप्रथम भगवान विष्णु की विधि विधान से पूजा करें। इसके पश्चात भगवान का ध्यान करते हुए  मंत्र का जाप करें।

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”

– इस दिन भक्ति भाव से कथा सुनना और भगवान का कीर्तन करना चाहिए, कथा के बाद एकादशी माता और नारायण भागवान की आरती अवश्य करे|

-अपनी यथा शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों या गरीबों को दान अवश्य करे |

-इसके बाद दान, पुण्य आदि कर इस व्रत का विधान पूर्ण होता है।

-द्वादशी के दिन एकादशी व्रत का पारण (खोला) जाता है |

योगिनी  एकादशी  महत्व व फल 

 

इस एकादशी को पाप के प्रायश्चित के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है|इस दिन श्री हरि विष्णु के भजन कीर्तन से पापों से मुक्ति मिलती है|

योगिनी एकादशी का उपवास दशमी की रात्रि से शुरू होकर द्वादशी की तिथि में व्रत पारण तक चलता है | और यह एकादशी पापों का नाश करने के लिए की जाती है|

इस दिन पीपल के वृक्ष की पूजा करने की भी मान्यता है|

 

योगिनी एकादशी व्रत कथा

श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन! आषाढ़ कृष्ण एकादशी का नाम योगिनी है। इसके व्रत से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यह इस लोक में भोग और परलोक में मुक्ति देने वाली है। यह तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। मैं तुमसे पुराणों में वर्णन की हुई कथा कहता हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो-

स्वर्गधाम की अलकापुरी नामक नगरी में कुबेर नाम का एक राजा रहता था। वह शिव भक्त था और प्रतिदिन शिव की पूजा किया करता था। हेम नाम का एक माली पूजन के लिए उसके यहाँ फूल लाया करता था। हेम की विशालाक्षी नाम की सुंदर स्त्री थी। एक दिन वह मानसरोवर से पुष्प तो ले आया लेकिन कामासक्त होने के कारण वह अपनी स्त्री से हास्य-विनोद तथा रमण करने लगा।
इधर राजा उसकी दोपहर तक राह देखता रहा। अंत में राजा कुबेर ने सेवकों को आज्ञा दी कि तुम लोग जाकर माली के न आने का कारण पता करो, क्योंकि वह अभी तक पुष्प लेकर नहीं आया। सेवकों ने कहा कि महाराज वह पापी अतिकामी है, अपनी स्त्री के साथ हास्य-विनोद और रमण कर रहा होगा। यह सुनकर कुबेर ने क्रोधित होकर उसे बुलाया।

हेम माली राजा के भय से काँपता हुआ ‍उपस्थित हुआ। राजा कुबेर ने क्रोध में आकर कहा- ‘अरे पापी! नीच! कामी! तूने मेरे परम पूजनीय ईश्वरों के ईश्वर श्री शिवजी महाराज का अनादर किया है, इस‍लिए मैं तुझे शाप देता हूँ कि तू स्त्री का वियोग सहेगा और मृत्युलोक में जाकर कोढ़ी होगा।’
कुबेर के शाप से हेम माली का स्वर्ग से पतन हो गया और वह उसी क्षण पृथ्वी पर गिर गया। भूतल पर आते ही उसके शरीर में श्वेत कोढ़ हो गया। उसकी स्त्री भी उसी समय अंतर्ध्यान हो गई। मृत्युलोक में आकर माली ने महान दु:ख भोगे, भयानक जंगल में जाकर बिना अन्न और जल के भटकता रहा।

उसे देखकर मारर्कंडेय ऋषि बोले तुमने ऐसा कौन-सा पाप किया है, जिसके प्रभाव से यह हालत हो गई। हेम माली ने सारा वृत्तांत कह ‍सुनाया। यह सुनकर ऋषि बोले- निश्चित ही तूने मेरे सम्मुख सत्य वचन कहे हैं, इसलिए तेरे उद्धार के लिए मैं एक व्रत बताता हूँ। यदि तू आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी नामक एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करेगा तो तेरे सब पाप नष्ट हो जाएँगे।
यह सुनकर हेम माली ने अत्यंत प्रसन्न होकर मुनि को साष्टांग प्रणाम किया। मुनि ने उसे स्नेह के साथ उठाया। हेम माली ने मुनि के कथनानुसार विधिपूर्वक योगिनी एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से अपने पुराने स्वरूप में आकर वह अपनी स्त्री के साथ सुखपूर्वक रहने लगा।

भगवान कृष्ण ने कहा- हे राजन! यह योगिनी एकादशी का व्रत 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर फल देता है। इसके व्रत से समस्त पाप दूर हो जाते हैं और अंत में स्वर्ग प्राप्त होता है।

कथा के बाद आरती अवश्य करे |

yogini ekadashi vrat katha

एकादशी की आरती 

 

ओम जय एकादशी जय एकादशी जय एकादशी माता, विष्णु धारण करें शक्ति मुक्ति पाता |
तेरे नाम गिनाऊ देवी भक्ति प्रदान करनी ,गण गौरव की देनी माता शास्त्रों में वरनी|
मार्गशीर्ष के कृष्ण पक्ष में उत्पन्न होती ,शुक्ल पक्ष में मोक्ष दायिनी पापों को धोती |
पौष मास के कृष्ण पक्ष की सफला नामक है, शुक्ल पक्ष में हुए पुत्रदा में कृष्ण पक्ष आवे|
शुक्ल पक्ष में जया कहावे विजय सदा पावे|

विजया फाल्गुन कृष्ण पक्ष में शुक्ल आमलकी, पापमोचनी कृष्ण पक्ष में चैत्र माह बलिकी |
चैत्र शुक्ल में नाम कामदा धन देने वाली, नाम वरुथिनी कृष्ण पक्ष में वैशाख महावाली|
शुक्ल पक्ष में हुए मोहिनी अपरा अपरा ज्येष्ठ कृष्ण पक्षी ,नाम निर्जला सभी सुख करनी शुक्ल पक्ष रखी |
योगिनी नाम आषाढ़ में जानो कृष्ण पक्ष धरनी|

कामिका  श्रावण मास में आवे कृष्ण पक्ष कहिए, श्रावण शुक्ल में होय पुत्रदा आनंद से रहिए|
भाद्रपद कृष्ण पक्ष की परिवर्तीनी शुक्ला, इंद्र अश्वनी कृष्ण पक्ष में व्रत से भवसागर निकला |
पाम्पाकुशा है शुक्ल पक्ष में पाप हरण हारी ,रमा मास कार्तिक में आवे सुखदायक भारी |
देवोत्थानी शुक्ल पक्ष की दुख नाशक मैया, लौंद मास की करू विनती पार करो नईया |
शुक्ला में हुए पद्मिनी दुख दरिद्र हरिणी ,परमा कृष्ण पक्ष में होती जनमंगल करनी |
जो कोई आरती एकादशी की भक्ति सहित गावे, जन रघुनाथ स्वर्ग का वासा निश्चय वह फल पावे |
ओम जय एकादशी एकादशी जय एकादशी माता…

 

विष्णु जी की आरती 

 

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।

भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥

जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।

सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय…॥

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।

तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय…॥

तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥

पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय…॥

तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।

मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय…॥

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।

किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय…॥

दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।

अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय…॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।

श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय…॥

तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।

तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय…॥

जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।

कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय…॥

 

शुभ समय

अभिजित मुहूर्त :12:13-13:05

अमृत काल :27:13:36-28:59:24

 

मुझे आशा है कि आपको यह पोस्ट पसंद आई होगी | Religion से related और भी जानकारी आप यही प्राप्त कर सकते है |

धन्यवाद !

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